ईश्वर क्या है ?
- Public Vocal
- Nov 17, 2022
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Updated: Feb 20, 2023

ईश्वर क्या है ?
क्या आप जानते हैं कि भगवान - जिस पर कुछ लोग विश्वास करते हे और कुछ नहीं, वह क्या है । मैंने बहुत बार कई लोगों को या फिर स्वयं अपने दोस्तों को यह कहते हुए सुना है कि वे भगवान को नहीं मानते और ऐसी किसी भी धार्मिक चीज पर विश्वास नहीं करते। तो ऐसे सभी लोग जिन्हें ईश्वर पर विश्वास नहीं है, उनसे मेरा एक प्रश्न है कि क्या वे जानते है। कि 'ईश्वर' वास्तव में किसे कहते हैं ओ वह क्या है? शायद उनके लिए भगवान का अर्थ केवल वे मूर्तियाँ व पत्थर ही हैं जिनको मंदिरों में पूजा जाता है। बस फर्क इतना है कि वे इस पर विश्वास नहीं करते और कुछ करते हैं। वास्तविकता तो यह है कि इन लोगों को ज्ञात नहीं है कि सही अर्थों में ईश्वर क्या है और क्या है उसका वजूद।
मेरे विचार से ईश्वर का दूसरा नाम 'विश्वास' है। जो आप के भीतर है वह है ईश्वर श्री कबीरदास ने अपने दोहों में कहा है कि दरअसल जिसे ईश्वर को हम धार्मिक स्थलों में ढूँढते हुए भटकते हैं वह कहीं ओर नहीं बल्कि स्वयं के भीतर हैं वह है हमारी आत्मा जो परमात्मा का ही अंश है। जब भी हम कोई दुष्कर्म करते हैं या फिर करने वाले होते हैं। तो कुछ है जो हमारे भीतर से हमें रोकता है, हमें धिककारता है। जो हमें एहसास दिलाता है कि यह अनुचित है और हमारा मार्गदर्शन करती है वह है हमारी आत्मा और यही है. ईश्वर । किसी का अहित चाहने पर अगर आपको भीतर से भय लगता है तो वह भय है ईश्वर का । जब आप किसी भी तरह की पेरशानी में होते है। किन्तु फिर भी आपके मन में कहीं न कहीं एक आशा की किरण होती है - वह किरण है ईश्वर जो हमें हिम्मत देती है तथा हमारे भीतर एक सकारात्मक ऊर्जा पैदा करती है। ईश्वर एक भावना, एक विश्वास है, एक अहसास है जिसकी तुलना नहीं की जा सकती, जिसको मापा नहीं जा
सकता केवल महसूस किया जा सकता है। लेकिन उसको महसूस के लिए आपको स्वयं पर विश्वास करना होगा। साथ ही अपने मन और आत्मा का मिलन करवाना होगा जो एकदम विपरीत है। मन जो बहुत अस्थिर है और आत्मा जो हमेशा स्थिर रहती है। मन मचलता है जो बहुत से अनुचित कार्य करने के लिए उकसाता है लेकिन आत्मा पवित्र है जो हमेशा सही मार्ग दर्शन करती है। अगर आप स्वयं पर भरोसा करते हैं। तो इसका यही अर्थ है कि आप ईश्व पर भी विश्वास करते हैं यदि फिर भी आप कहते है कि आप ईश्वर पर विश्वास नही करते तो फिर इसका तो एक ही अर्थ है कि आप स्वयं पर ही विश्वास नहीं करते। श्री स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा कि "आप तब तक ईश्वर पर विश्वास नहीं कर सकते जब तक आप स्वयं पर विश्वास नहीं करते।" धर्मो ने ईश्वर को बाँट दिया है। अलग-अलग धर्म ने उसको अलग-अलग नाम दे दिए हैं। वास्तविकता तो यह कि इतने नाम होने के बाद भी वह एक है।
दोस्तों, जिस ईश्वर को मैं मानती उसका कोई नाम या कोई आकार नहीं है क्योंकि भावना या विश्वास का कोई नाम आकार नहीं होता । वह किसी हिंदू, मुस्लिम या सिख धर्म का नहीं है, ये धर्म तो लोगों के है उसका धर्म है 'मानवता' जो केवल एक ही सीख देता है कि हिंदू, मुस्लिम, सिख या ईसाई होने से पहले हम एक मानव है।
ईश्वर को मानो तो वह है लेकिन वह आप पर निर्भर करता है कि आप के लिए ईश्वर की परिभाषा क्या है। मेरे लिए ईश्वर की जो परिभाषा है उसके हिसाब से तो वह है मेरे भीतर है और आप सब के भीतर भी। अगर आप यह कहते हैं कि आप भगवान पर विश्वास नहीं करते क्योंकि आप उसे देख नहीं सकते तो मैं आप से पूछना चाहूँगी कि क्या आपने वास्तव में कभी उसे देखने की कोशिश की है? शायद नहीं ! अगर आप उसे देखना चाहते हैं तो वह आपको हर चीज में दिखेगा। वह आप को किसी इंसान में दिख सकता है, बारिश की बूंदों में दिख सकता है और चाहों तो पत्थर में भी दिख सकता है लेकिन यही तो परेशानी है कि हमारी दृष्टि उसे देख नहीं पाती क्योंकि वह जानती है ही नहीं कि ईश्वर क्या है और वह क्या देखना चाहती है?
ईश्वर के होने का इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है हम है। एक विश्वास और आशा पर अपनी जिंदगी जीते जा रहे है- यही विश्वास ही तो ईश्वर है।
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